कौन था राइफलमैन गब्बर सिंह, जिनकी बहादुरी को आज भी ब्रिटिश सरकार करती है सलाम

रिपोर्ट- नेशनल खबर डेस्क रिपोर्ट
देश को उतराखंड के गढ़वाल ने कई वीर सैनिक दिए हैं, जिनकी वीरता हमें सीमा पर डटे जवानों में नजर आती हैं।
लेकिन आज हम एक ऐसे बहादुर जवान के बारे में बताएंगे जिनकी वजह से गढ़वाल को लैंड आफ गब्बर सिंह के नाम से जाना जाता है। बात कर रहे हैं राइफलमैन गब्बर सिंह नेगी की जोकि महज 20 वर्ष की उम्र में अपने वतन के लिए खुद को कुर्बान कर दिया। आज यहाँ हर घर का बच्चा वीर गब्बर सिंह की बहादुरी और दुश्मनों का डटकर किये गये मुकाबले के किस्से सुनकर बड़े होते है। उनके वीरता की कहानियां सुनकर यहां के बच्चों में सेना में भर्ती होने का एक अलग ही जुनून दिखाई देता है।

1895 में गढ़वाल के मंजयूड में गब्बर सिंह नेगी का जन्म हुआ था। 1913 में गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हुए। राइफलमैन गब्बर सिंह भारतीय सेना की ओर से प्रथम विश्व युद्ध में लडे़ थे। जिन्हें 1914 में प्रथम विश्व युद्ध में लड़ने के लिए फ्रांस भेजे गए। बटालियन द्वितीय गढ़वाल राइफल की कप्तानी गब्बर सिंह नेगी को मिली। गब्बर सिंह ने अपनी वीरता और शौर्य से जर्मन सेना के 350 जवानों को बंदी बना लिया और न्यू शैपल लैंड पर भी जीत हासिल की। युद्ध में अपने पराक्रम का परचम लहराते हुए 10 मार्च 1915 को वीरगति को प्राप्त हो गए।

इस युद्ध में गब्बर सिंह ने जिस निर्भीकता के साथ दुश्मनों को पस्त किया था ब्रिटिश सैनिक भी ये देख दंग रह गए। राइफलमैन गब्बर सिंह नेगी को इसी साहस के लिए शहीदोपरांत उन्हें ब्रिटिश सरकार की तरफ से सर्वोच्च सम्मान ‘विक्टोरिया क्रॉस’ से नवाजा गया। यहाँ तक की लंदन में भी उनके नाम से मेमोरियल बनाया गया जहाँ हर साल उनके जन्मदिन पर उन्हें याद किया जाता है।

वहीं गढ़वाल राइफल ने भी 1925 में चंबा में एक मेमोरियल बनवाया जहाँ प्रतिवर्ष उनकी शहादत को नमन किया जाता है। साथ ही हर साल उनके जन्मदिन पर एक मेले का भी आयोजन किया जाता है। जिसमें शहीद गब्बर सिंह नेगी की शौर्य गाथाएं सुनाई जाती है।

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