बंगाल में फिर से ममता का ‘राज’…आखिर क्यों बीजेपी गई हार ?

रिपोर्ट- भारती बघेल

करीब 90 दिनों के चुनाव प्रचार… और महामारी के बीच फिर ममता बनर्जी का उदयकाल हो गया है…200 प्लस सीटों पर अपने ताबड़तोड़ प्रचार के बदौलत जीत हासिल करने वाली ममता बनर्जी के लिए ये जीत कितनी बड़ी है उसे उस चुनावी अभियान से समझना होगा..जिसमें ममता बनर्जी के पैर में चोट लगे होने के बावजूद भी व्हीलचेयर पर बैठकर चुनावी मैदान में डटी रहीं

5 जनवरी 1955 को कोलकाता के एक सामान्य परिवार में जन्मीं ममता बनर्जी 2011 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी थीं…उस दौर में जब ममता बनर्जी ने सत्ता संभाली तो मात दी एक ऐसे दल को जिसने 34 वर्षों तक सत्ता का राज उत्कर्ष देखा था…अगर निजी जीवन की बात करें तो कलकत्ता में जन्म के बाद ममता बनर्जी ने यहीं पर प्रारंभिक शिक्षा ली…ममता ने कोलकाता से ग्रेजुएशन किया..उसके बाद उन्होंने एक लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री भी ली..70 के दशक में सिर्फ 15 साल की उम्र में कांग्रेस पार्टी से ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की…ममता बनर्जी साल 1975 एक पदाधिकारी के रुप मे अपना काल संभाला और पश्चिम बंगाल में महिला कांगेस की जनरल सेक्रेटरी नियुक्त हुई…

आपको ये भी बता दें की ममता बनर्जी कलकत्ता दक्षिण से 1978 में कांग्रेस जिला कमिटी की सेक्रेटरी भी बनीं, साथ ही ममता बनर्जी को 1984 में प्रथम बार लोकसभा के चुनाव का टिकट मिला…कांग्रेस पार्टी की तरफ से ये टिकट मिला…ममता बनर्जी का संबंध राजीव गांधी से कुछ ऐसा था कि राजीव गांधी के बंगाल दौरों के दौरान ममता बनर्जी अक्सर उनके पीछे खड़ी हुई दिखाई देती थीं..1984 में ममता बनर्जी को टिकट राजीव गांधी ने ही दिया और उसके दक्षिण कोलकाता जो कि तत्कालीन कलकत्ता सीट थी..उससे ममता चुनी गईं…1991 में पुनः ममता लोकसभा की सांसद बनीं और इसके बाद सरकार ने उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री का पद दिया गया…ममता बनर्जी 1996 में एक बार फिर सांसद बनीं…1997 उन्होंने कांग्रेस पार्टी से अपना नाता तोड़ लिया और उसके बाद ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया…

वहीं 2021 में बीजेपी ऐडी-चोटी का जोर लगाने के बाद भी आखिर कैसे हार गई ये बड़ा सवाल उठता है…तो ऐसे ही कुछ फेक्ट पर आज हम चर्चा करेंगे और बताएंगे की बीजेपी कहां चूक गई…

बीजेपी के पास मुख्यमंत्री के चेहरे की कमी
बीजेपी के हारने की सबसे बड़ी वजह यही है कि बीजेपी के पास कोई चेहरा नहीं था जिसे वो ममता बनर्जी के सामने खड़ा रह पाती…बीजेपी के पास बड़े चेहरे की कमी नहीं है…

दलबदलुओं पर जनता की मार
दलबदलु नेेताओं को इस बार जनता ने भी भाव नहीं दिया है..आपको बतादें कि टीएमसी छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए ज्यादातर नेताओं को इस बार हार का मुंह देखना पड़ा है..एक आंकड़े के मुताबिक पिछले दो सालों में टीएमसी के करीब एक दर्जन से ज्यादा विधायकों सहित 30 नेताओं ने बीजेपी से चुनाव लड़ना मंहगा पड़ा..

ओवैसी- पीरजादा फैक्टर हुआ फेल
बंगाल में इन दोनों के चुनावी मैदान में उतरने से ये अंदेशा लगाया जा रहा था कि टीएमसी के वोटबैंक पर फर्क पड़ेगा…लेकिन टीएमसी की जीत के बाद ये बात साफ हो गई…बंगाल में ओवैसी और पीरजादा का फैक्टर पूरी तरह फेल हो गया…

सॉफ्ट हिंदुत्व का ममता की जीत पर जबरदस्त प्रभाव
बीजेपी ने जय श्री राम के नारे को लेकर जब ममता को घेरा तो ममता ने भी सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति अपना ली जिसका सीधा असर इस बार के चुनावों में देखने को मिला…

बीजेपी का दांव उसी पर पड़ा उल्टा
ध्रुवीकरण के दांव में बीजेपी ही उल्टी फंस गई जी हां हिंदु वोट एकजुट करने की आस में बीजेपी ने अनजाने में ममता बनर्जी का फायदा करा दिया क्योंकि एकतरफा मुस्लिम वोट टीएंसी के खाते में चले गए…और इतना ध्रुवीकरण भी नहीं हो पाया जितना बीजेपी ने सोच रखा था…

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