बौध्द धर्म की उत्पत्ति और विशेषताएं

रिपोर्ट- भारती बघेल

एक बार एक व्यक्ति ने एक सन्यासी को गालियां दीं वे चुपचाप सुनते रहे…उस व्यक्ति का गाली देना बंद हुआ तो सन्यासी ने पूछा…वत्स यदि कोई दान को स्वीकार न करे तो उस दान का क्या होगा…व्यक्ति ने उत्तर दिया वह देनेवाले के पास ही रह जाएगा…तो सन्यासी ने कहा मैं तुम्हारी गालियां स्वीकार नहीं करता…इस तरह के संयम और धैर्य को प्राप्त करने वाले सन्यासी एशिया के ज्योतिपुंज कहे जाने वाले महात्मा बुध्द थे…

महात्मा बुध्द ने बौध्द धर्म की स्थापना की थी…ये भारतीय उपमहाद्वीप में उत्पन्न होने वाले संसार के प्रमुख धर्मों में से एक है…भारत के नास्तिक दर्शन की विचारधाराओं में बौध्द धर्म प्रमुख है..इस धर्म की उत्पत्ति जरुर भारत में हुई है लेकिन आज यह श्रीलंका, म्यांमार,लाओस, कमेबोडिया,थाईलैंड और चीन का प्रमुख धर्म है.. बौध्द धर्म के संस्थापक महात्मा बुध्द का जन्म शाक्य वंश के राजा शुध्दोधन तथा रानी महामाया के यहां हुआ था…उनका जन्मस्थान नेपाल के लुम्बिनी में माना जाता है…इनके बचपन का नाम सिध्दार्थ था..सांसारिक दुखों से द्रवित होकर उन्होंने 29 साल की आयु में गृह त्याग दिया था..बाद में उन्हें 35 साल की आयु में ज्ञान प्राप्त हुआ…तबसे राजकुमार सिध्दार्थ बुध्द कहलाए…

बुध्द ने ज्ञान प्राप्ति के बाद पहला प्रवचन वाराणसी के पास सारनाथ नामक स्थान में दिया था..एक परंपरा के मुताबिक गौतम बुध्द ने 483 ईसा पूर्व में कुशीनगर नामक स्थान पर शरीर त्यागा था…बौध्द धर्म में गृहत्याग की घटना को महाभिनिष्क्रमण बनताया गया है…वहीं पहले प्रवचन की घटना को धर्मचक्रप्रवर्तन और शरीर त्याग की घटना को महापरिनिर्वाण कहा गया है…

–बौध्द धर्म के उदय के प्रमुख कारण
वैदिक समाज चार वर्णों में प्रभावित था…हर वर्ण के कर्तव्य अलग अलग निर्धारित थे…जिनमें ब्राहम्ण एवं क्षत्रियों को विशेषाधिकार मिले हुए थे…वैश्य खेती और पशुपालन करते थे…वहीं शुद्रों का कर्तव्य ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करना था..यह स्वभाविक ही था कि इस तरह के वर्ण विभाजन वाले समाज में तनाव की स्थिति पैदा हो जाए…ब्राहम्णों को प्राप्त विशेषाधिकारों पर क्षत्रिय आपत्ति करते थे…लिहाजा ब्राहम्णों की श्रेष्ठता के विरुध्द क्षत्रियों को खड़ा होना बौध्द धर्म के उदय का एक कारण बना…गौरतलब है कि बौध्द धर्म के संस्थापक गौतम बुध्द भी क्षत्रिय थे…इसके अलावा बोध्द धर्म के उद्भव के कुछ यथार्थ कारण भी हैं.. सिक्कों के प्रचलम से जब व्यापार बढ़ा तो वैश्यों की स्थिति में सुधार हुआ..अब वे सामाजिक प्रतिष्ठा भी चाहते थे…ब्राहम्णों के कानून की किताबों में सूतखोरी की निंदा की जाती थी..इसलिए वैश्य किसी ऐसे धर्म को अपनाना चाहते थे जहां वे सम्मान पा सकें…

दूसरे कारण की बात करें तो कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में पशुओं की जरुरत…वैदिक व्यवस्था में पशुओं की बलि दी जाती थी..जबकि यह धर्म अहिंसा का समर्थन करता था…इस कारण लोग बौध्द धर्म के प्रति आकर्षित हुए…वहीं अगर लोगों के बीच इस धर्म के प्रचार प्रसार की बात करें तो पहला कारण है यह धर्म जातिगत भेदभाव को स्थान नहीं देता था…इससे लोगों में सामाजिक चेतना का संचार हुआ…और वे इस धर्म के प्रति आकर्षित हुए..

तीसरा कारण है कि बौध्द धर्म आत्मा और परमात्मा के वाद विवादों में उलझने के बजाय सांसारिक समस्याओं पर केंद्रित था…

चौथा कारण है इस धर्म में जनसाधारण की भाषाा पाली के प्रचार का माध्यम बनाया गया..

पांचवा कारण है कि बौध्द धर्म के संघ में प्रवेश को लेकर जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता था…हर धर्म उत्पत्ति के समय से ही कुछ प्रमुख सिध्दांतों पर आधारित होता है जो उस धर्म का दर्शन कहलाता है…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *