
Report by : Sakshi Singh, National Khabar
- विलुप्त होती खुशबू : एक युग का अंत
- मुंबई की पहचान और पार्ले-जी की विरासत
Mumbai की एक पहचान का अंत
मुंबई के विले पार्ले इलाके में कभी सुबह-सुबह हवा में घुली रहती थी-ताज़ा बेक हुए पार्ले-जी बिस्कुट की भीनी खुशबू। यह खुशबू सिर्फ एक खाद्य पदार्थ की नहीं,बल्कि पीढ़ियों की यादों, स्कूल के टिफिन, ट्रेन यात्राओं और मध्यमवर्गीय भारत के भरोसे की प्रतीक थी। लेकिन साल 2016 के मध्य से यह खुशबू धीरे-धीरे गायब हो गई। अब, वही ऐतिहासिक फैक्ट्री—जहां से भारत के सबसे पहचानने योग्य बिस्कुट का जन्म हुआ—पूरी तरह इतिहास के पन्नों में दर्ज होने जा रही है।
Mumbai : पार्ले प्रोडक्ट्स का बड़ा फैसला
पार्ले प्रोडक्ट्स ने अपने सबसे पुराने मैन्युफैक्चरिंग परिसर—विले पार्ले ईस्ट—को पुनर्विकसित (रीडेवलप) करने की योजना बनाई है। यह वही जगह है जहां कभी पार्ले-जी ने आकार लिया, लोकप्रियता पाई और देशभर के घरों तक पहुंच बनाई। कंपनी अब इस ऐतिहासिक औद्योगिक परिसर को एक विशाल कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में बदलने जा रही है।
यह फैसला केवल एक रियल एस्टेट परियोजना नहीं है, बल्कि मुंबई के औद्योगिक इतिहास के एक युग के अंत का संकेत भी है।
Mumbai : परियोजना का दायरा और भूमि का महत्व
प्रस्तावित रीडेवलपमेंट विले पार्ले ईस्ट में स्थित 5.44 हेक्टेयर (लगभग 13.45 एकड़) के विशाल भूखंड पर किया जाएगा, जिसका कुल क्षेत्रफल 54,438.80 वर्ग मीटर है। मुंबई जैसे शहर में, जहां हर इंच जमीन की कीमत सोने से कम नहीं, यह भूखंड अत्यंत प्राइम लोकेशन में आता है।
यह इलाका एयरपोर्ट, वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे, रेलवे स्टेशन और प्रमुख व्यावसायिक केंद्रों के बेहद करीब है। यही कारण है कि इस जमीन का व्यावसायिक मूल्य असाधारण रूप से अधिक है।
निर्माण योजना: आंकड़ों में मेगा प्रोजेक्ट
इस परियोजना के तहत कुल निर्मित क्षेत्र (Built-up Area) 1,90,360.52 वर्ग मीटर प्रस्तावित है। इसमें—
Mumbai : फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) के अंतर्गत निर्माण:
1,21,698.09 वर्ग मीटर
नॉन-FSI निर्माण:
68,662.43 वर्ग मीटर
नॉन-FSI क्षेत्र में बेसमेंट पार्किंग, यूटिलिटी एरिया, सर्विस फ्लोर और अन्य तकनीकी संरचनाएं शामिल हो सकती हैं, जो बड़े कमर्शियल प्रोजेक्ट्स के लिए आवश्यक होती हैं।
लगभग 4,000 करोड़ रुपये का निवेश
इस पूरी परियोजना की अनुमानित लागत 3,961.39 करोड़ रुपये आंकी गई है। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि पार्ले प्रोडक्ट्स इस पुनर्विकास को सिर्फ जमीन के उपयोग में बदलाव के रूप में नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक, रणनीतिक निवेश के रूप में देख रहा है।
इतने बड़े निवेश के साथ, यह प्रोजेक्ट मुंबई के प्रमुख कमर्शियल हब्स—जैसे बीकेसी और लोअर परेल—को भी कड़ी प्रतिस्पर्धा दे सकता है।
Mumbai : औद्योगिक से व्यावसायिक: बदलती मुंबई
पार्ले फैक्ट्री का यह परिवर्तन मुंबई में चल रहे एक बड़े ट्रेंड का हिस्सा है। पिछले दो दशकों में शहर की कई पुरानी मिलें और फैक्ट्रियां—चाहे वो टेक्सटाइल मिल्स हों या मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स—अब मॉल, ऑफिस कॉम्प्लेक्स और लग्ज़री रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स में बदल चुकी हैं।
लोअर परेल, परेल, वर्ली और अंधेरी जैसे इलाके इसके उदाहरण हैं। अब विले पार्ले भी इस बदलाव की कड़ी में जुड़ रहा है।
Mumbai : पार्ले-जी: सिर्फ बिस्कुट नहीं, एक भावना
पार्ले-जी केवल एक उत्पाद नहीं था; यह भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रहा है। कम कीमत, हर जगह उपलब्धता और भरोसेमंद स्वाद ने इसे दशकों तक “कॉमन मैन का बिस्कुट” बनाए रखा।
विले पार्ले की फैक्ट्री उस भावना की भौतिक प्रतीक थी। यहां काम करने वाले मजदूर, आसपास की चाय की दुकानें, ट्रक लोडिंग की आवाज़ें—सब मिलकर एक जीवंत औद्योगिक माहौल रचते थे। इसके बंद होने से न सिर्फ एक फैक्ट्री, बल्कि एक पूरी इकोसिस्टम भी खत्म हो गया।
Mumbai : कर्मचारियों और स्थानीय समुदाय पर असर
फैक्ट्री बंद होने के बाद कर्मचारियों को अन्य यूनिट्स में स्थानांतरित किया गया या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति जैसी योजनाओं के तहत समायोजित किया गया। हालांकि, स्थानीय स्तर पर रोज़गार और छोटे व्यवसायों पर इसका असर पड़ा।
रीडेवलपमेंट से भविष्य में नई नौकरियां पैदा होंगी, लेकिन उनका स्वरूप पूरी तरह अलग होगा—मैन्युफैक्चरिंग की जगह अब कॉर्पोरेट ऑफिस, रिटेल और सर्विस सेक्टर हावी होगा।
Mumbai : विरासत बनाम विकास की बहस
इस परियोजना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है—क्या विकास की दौड़ में हम अपनी औद्योगिक और सांस्कृतिक विरासत को खो रहे हैं?
कई लोगों की राय है कि इस ऐतिहासिक स्थल का कम से कम एक हिस्सा—जैसे म्यूज़ियम या हेरिटेज स्पेस—पार्ले-जी की विरासत को समर्पित किया जाना चाहिए। हालांकि, फिलहाल कंपनी की ओर से ऐसी किसी आधिकारिक योजना की घोषणा नहीं हुई है।
Mumbai : भविष्य की तस्वीर
पार्ले प्रोडक्ट्स का यह कदम बताता है कि भारतीय कॉरपोरेट जगत अब अपने पारंपरिक औद्योगिक ढांचे से आगे बढ़कर एसेट मोनेटाइजेशन और शहरी पुनर्विकास की दिशा में सोच रहा है।
विले पार्ले की जमीन पर खड़ा होने वाला नया कमर्शियल कॉम्प्लेक्स भविष्य का प्रतीक होगा—कांच, कंक्रीट और कॉर्पोरेट लोगो से सजा हुआ। लेकिन इसकी नींव में दबा रहेगा वह इतिहास, जब इसी जगह से देशभर में पार्ले-जी की खुशबू फैला करती थी।
विले पार्ले की पार्ले फैक्ट्री का पुनर्विकास आर्थिक दृष्टि से भले ही एक समझदारी भरा कदम हो,लेकिन भावनात्मक रूप से एक युग का अंत है। यह कहानी सिर्फ एक ज़मीन या प्रोजेक्ट की नहीं,बल्कि उस भारत की है जो धीरे-धीरे अपने आद्योगिक अतीत से आगे बढ़ रहा है।