Yuvraj Singh Mehta Accident Case : कार में इतने एडवांस फीचर्स, लेकिन ऐसा फीचर क्यों नहीं कि कार डूबे तो शीशा तोड़कर बाहर निकल सकें ?

Report by : Sakshi Singh, National Khabar

Yuvraj Singh Mehta :- आज की आधुनिक कारें तकनीक का बेहतरीन नमूना बन चुकी हैं। एक बटन दबाते ही एयरबैग खुल जाते हैं, हल्की सी चूक पर ABS और ESC गाड़ी को संभाल लेते हैं, लेन बदलने पर अलर्ट मिल जाता है और कई कारें तो खुद-ब-खुद ब्रेक भी लगा देती हैं। सनरूफ, 360 डिग्री कैमरा, ADAS, ऑटो पार्किंग और वॉइस कमांड जैसे फीचर्स अब लग्ज़री नहीं, बल्कि धीरे-धीरे आम होते जा रहे हैं।

लेकिन जब बात जान बचाने की सबसे चरम स्थिति की आती है—जैसे कार का पानी में डूब जाना—तो एक सवाल बार-बार उठता है:
कार में ऐसा फीचर क्यों नहीं होता, जिससे आप आसानी से शीशा तोड़कर बाहर निकल सकें?

Yuvraj Singh Mehta :- कार डूबने के हादसे : एक अनदेखा लेकिन घातक खतरा

हर साल देश और दुनिया में सैकड़ो लोग ऐसे हादसों में जान गंवा देते हैं, जहां उनकी कार नदी, नहर, झील या जलभराव वाले अंडरपास में डूब जाती है। कई मामलों में:

एयरबैग और सीट बेल्ट सुरक्षित रहते हैं
कार इंजन बंद हो जाता है
इलेक्ट्रॉनिक विंडो और सेंट्रल लॉक काम करना बंद कर देते हैं

और कुछ ही मिनटों में कार पानी से भर जाती है।

ज्यादातर मौतें चोट से नहीं, बल्कि डूबने से होती हैं। दुखद बात यह है कि कई बार लोग कार के अंदर फंसे रहते हैं, क्योंकि वे शीशा तोड़ नहीं पाते।

Yuvraj Singh Mehta :- शीशा तोड़ना इतना मुश्किल क्यों होता है?

आधुनिक कारों में इस्तेमाल होने वाले शीशे आम तौर पर दो तरह के होते हैं:

  1. लैमिनेटेड ग्लास (Laminated Glass)

ज्यादातर फ्रंट विंडशील्ड में
दो शीशों के बीच प्लास्टिक की परत
बहुत मजबूत, आसानी से टूटता नहीं
टूटने पर भी बिखरता नहीं

  1. टेम्पर्ड ग्लास (Tempered Glass)

साइड विंडो और रियर ग्लास में
टूटने पर छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखरता है
लेकिन मोटाई और मजबूती के कारण हाथ-पैर से तोड़ना लगभग नामुमकिन

यानी संकट की घड़ी में सामान्य इंसान के लिए कार का शीशा तोड़ पाना बेहद कठिन होता है।

Yuvraj Singh Mehta :- तो फिर कंपनियां ऐसा फीचर क्यों नहीं देतीं?

यह सवाल जितना सरल लगता है, जवाब उतना ही जटिल है। इसके पीछे कई कारण हैं:

  1. सुरक्षा बनाम दुरुपयोग

अगर कार में “शीशा तोड़ने का मैकेनिज़्म” दिया जाए, तो:

चोरी और तोड़फोड़ का खतरा बढ़ सकता है
असामाजिक तत्व इसका गलत इस्तेमाल कर सकते हैं
कंपनियों के लिए यह एक बड़ा रिस्क फैक्टर है।

  1. स्ट्रक्चरल सेफ्टी का मुद्दा

कार की बॉडी और शीशे:

क्रैश सेफ्टी का अहम हिस्सा होते हैं
शीशा आसानी से टूटने लायक बनाया गया, तो दुर्घटना में गंभीर चोट का खतरा बढ़ सकता है

यानी मजबूती और इमरजेंसी एग्ज़िट के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं।

  1. रेगुलेटरी और लीगल बाधाएं

ऑटोमोबाइल सेफ्टी स्टैंडर्ड्स में अभी तक ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं
किसी फीचर के फेल होने पर कंपनियों पर कानूनी जिम्मेदारी आ सकती है

इसलिए कंपनियां वही फीचर देती हैं जो कानूनन सुरक्षित और स्वीकृत हों।

  1. उपभोक्ता मांग की कमी

ज्यादातर ग्राहक माइलेज, स्क्रीन, सनरूफ और ADAS पर फोकस करते हैं
“कार डूबने की स्थिति” को लोग दुर्लभ मानते हैं

जब तक मांग नहीं बनती, कंपनियां फीचर जोड़ने से बचती हैं।

Yuvraj Singh Mehta :- लेकिन तकनीक तो मौजूद है, फिर भी क्यों नहीं?

हैरानी की बात यह है कि समाधान मौजूद हैं:

  1. इमरजेंसी विंडो ब्रेकर

आज बाजार में छोटे-छोटे:

विंडो ब्रेकर हथौड़े
सीट बेल्ट कटर

मौजूद हैं, जो कुछ सेकंड में शीशा तोड़ सकते हैं। लेकिन ये:

एक्सेसरी के तौर पर बिकते हैं
कार का स्टैंडर्ड फीचर नहीं होते

  1. ऑटो विंडो रोल-डाउन सिस्टम

कुछ कॉन्सेप्ट्स में:

पानी का लेवल सेंसर
कार डूबते ही ऑटोमैटिक विंडो डाउन

जैसे फीचर्स पर काम हुआ है, लेकिन ये अभी आम नहीं हैं।

  1. मैकेनिकल इमरजेंसी रिलीज

Yuvraj Singh Mehta :- ऐसा लीवर या बटन:

जो इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम फेल होने पर भी काम करे
केवल इमरजेंसी में एक्टिव हो

यह भी तकनीकी रूप से संभव है।

Yuvraj Singh Mehta :- तो क्या भविष्य में ऐसा फीचर आ सकता है ?

ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री धीरे-धीरे :

पैसिव सेफ्टी से आगे बढ़कर
“एस्केप सेफ्टी”(Escape Safety) की ओर बढ़ रही हैं

जैसे :
ऑटोमैटिक SOS कॉल
रोलओवर में डोर अनलॉक

वैसे ही भविष्य में :

वाटर सबमर्जेंस डिटेक्शन
ऑटो विंडो रिलीज़
इनबिल्ट विंडो ब्रेकर

जैसे फीचर्स भी संभव हैं-अगर ग्राहक और रेगुलेटर इसकी मांग करें।

तकनीक नहीं, प्राथमिकता का सवाल

आज की कारों में फीचर्स की कमी नहीं है। कमी है तो इमरजेंसी स्थितियों को प्राथमिकता देने की सोच की।

Yuvraj Singh Mehta :- जब एक बड़ी स्क्रीन, एंबिएंट लाइट और सनरूफ स्टैंडर्ड हो सकते हैं, तो जान बचाने वाला फीचर भी स्टैंडर्ड क्यों नहीं?

शायद आने वाले समय में, जब ऐसे हादसों पर गंभीर चर्चा होगी, तब कंपनियां और सरकारें मिलकर इस सवाल का जवाब फीचर के रूप में देंगी—सिर्फ शब्दों में नहीं।

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