
Report by : Sakshi Singh, National Khabar
- Pollution Alert: जहरीली हवा और नई स्वास्थ्य चुनौती
- वायु प्रदूषण और मोटापा-डायबिटीज का गहरा कनेक्शन
Pollution:- वायु प्रदूषण और मोटापे-डायबिटीज का गहरा कनेक्शन
अब तक वायु प्रदूषण को सांस की बीमारियों, खासी, दमा और फेफड़ों की परेशानी से जोड़कर देखा जाता था। लेकिन हालिया रिसर्च ने एक और चिंताजनक सच सामने रखा है। जहरीली हवा न सिर्फ सांस लेना मुश्किल बना रही है, बल्कि यह मोटपा और टाइप-2 डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ा रही है।
वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन और The Lancet Planetary Health में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक,वायु प्रदूषण शरीर के मेटाबॉलिज़्म को प्रवाभित करता है,जिससे वजन बढ़ने और ब्लड शुगर असंतुलित होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
Pollution:- रिसर्च क्या कहती है?
वर्ष 2018 में प्रकाशित इस स्टडी ने पहली बार बड़े स्तर पर यह संकेत दिया कि एयर पॉल्यूशन और टाइप-2 डायबिटीज के बीच सीधा संबंध है। इसके बाद 2023–24 में सामने आए ताजा डेटा ने इन निष्कर्षों की पुष्टि की।
रिसर्च में यह पाया गया कि जो लोग लंबे समय तक PM2.5 (सूक्ष्म कण प्रदूषण) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों के संपर्क में रहते हैं, उनमें डायबिटीज और मोटापे का खतरा ज्यादा होता है—भले ही उनकी डाइट और लाइफस्टाइल औसत ही क्यों न हो।
Pollution:- PM2.5 क्या है और क्यों है सबसे खतरनाक?
PM2.5 बेहद सूक्ष्म कण होते हैं, जो हमारी आंखों से दिखाई नहीं देते। ये कण सांस के जरिए सीधे फेफड़ों तक पहुंचते हैं और वहां से खून में घुल जाते हैं।
ये हार्मोनल बैलेंस को बिगाड़ सकते हैं
शरीर में सूजन (Inflammation) बढ़ाते हैं
इंसुलिन की कार्यक्षमता को कम कर देते हैं
इसी वजह से शरीर ब्लड शुगर को सही तरीके से कंट्रोल नहीं कर पाता और धीरे-धीरे टाइप-2 डायबिटीज की ओर बढ़ता है।
Pollution:- वायु प्रदूषण और मोटापे का कनेक्शन
रिसर्च के मुताबिक, वायु प्रदूषण शरीर के फैट स्टोरेज सिस्टम को भी प्रभावित करता है।
प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से शरीर में:
तनाव हार्मोन (Cortisol) बढ़ता है
मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ता है
शरीर ज्यादा चर्बी जमा करने लगता है
यही वजह है कि कई लोग संतुलित भोजन और हल्की-फुल्की एक्सरसाइज के बावजूद वजन बढ़ने की शिकायत करते हैं।
Pollution:- डायबिटीज का खतरा क्यों बढ़ता है?
टाइप-2 डायबिटीज मुख्य रूप से इंसुलिन रेजिस्टेंस की वजह से होती है। रिसर्च बताती है कि वायु प्रदूषण:
शरीर में क्रॉनिक सूजन पैदा करता है
इंसुलिन के असर को कमजोर करता है
पैंक्रियाज पर दबाव डालता है
इसका नतीजा यह होता है कि शरीर को ज्यादा इंसुलिन की जरूरत पड़ती है और समय के साथ ब्लड शुगर लेवल बढ़ने लगता है।
शहरों में रहने वाले ज्यादा जोखिम में
स्टडी में यह भी सामने आया कि घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में रहने वाले लोग ज्यादा जोखिम में हैं।
ट्रैफिक का धुआं, इंडस्ट्रियल पॉल्यूशन, कंस्ट्रक्शन डस्ट और कम हरियाली—ये सभी फैक्टर मिलकर शहरी लोगों के स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रहे हैं।
खासतौर पर:
बच्चे
बुजुर्ग
पहले से मोटापे या प्री-डायबिटीज से जूझ रहे लोग
इन पर प्रदूषण का असर ज्यादा तेज़ी से होता है।
बच्चों और युवाओं के लिए भी खतरा
यह समस्या सिर्फ वयस्कों तक सीमित नहीं है। रिसर्च के अनुसार, जिन बच्चों का बचपन ज्यादा प्रदूषित माहौल में गुजरता है, उनमें:
मोटापे की संभावना कम उम्र में बढ़ जाती है
आगे चलकर डायबिटीज का खतरा ज्यादा होता है
यानी वायु प्रदूषण आने वाली पीढ़ियों की सेहत पर भी असर डाल रहा है।
क्या सिर्फ लाइफस्टाइल को दोष देना सही है?
अब तक मोटापे और डायबिटीज के लिए खराब खानपान और शारीरिक गतिविधि की कमी को ही जिम्मेदार माना जाता रहा है। लेकिन नई रिसर्च यह साफ करती है कि पर्यावरणीय कारणों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
एक स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के बावजूद यदि व्यक्ति लगातार जहरीली हवा में सांस ले रहा है, तो उसका स्वास्थ्य जोखिम में बना रहता है।
खुद को कैसे बचाएं?
हालांकि प्रदूषण पूरी तरह हमारे नियंत्रण में नहीं है, फिर भी कुछ उपाय अपनाकर जोखिम को कम किया जा सकता है:
AQI ज्यादा होने पर बाहर निकलने से बचें
मास्क का इस्तेमाल करें, खासकर ट्रैफिक वाले इलाकों में
घर में एयर प्यूरीफायर या पौधे लगाएं
एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर डाइट लें
नियमित व्यायाम और योग करें
समय-समय पर ब्लड शुगर और वजन की जांच कराएं
सरकार और समाज की भूमिका
रिसर्च यह भी संकेत देती है कि यह सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा है।
स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा
ट्रैफिक और इंडस्ट्रियल एमिशन पर नियंत्रण
ज्यादा हरियाली और खुले स्थान
इन कदमों के बिना प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों पर काबू पाना मुश्किल होगा।
जहरीली हवा अब सिर्फ सांस की बीमारी नहीं,बल्कि मोटपा और टाइप-2 डायबिटीज जैसी लाइफस्टाइल डिजीज की बड़ी वजह बनती जा रही है। वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन और The Lancet Planetary Health की रिसर्च इस बात की पुष्टि करती है कि प्रदूषण हमारे शरीर के अंदर तक असर डाल रहा है।