
Blinkit 10-Min Delivery: देश में तेजी से बढ़ते क्विक-कॉमर्स मॉडल ने लोगों की ज़िंदगी आसान बना दी है। अब सब्ज़ी, दूध, दवाइयां और रोज़मर्रा का सामान कुछ ही मिनटों में घर के दरवाज़े तक पहुंच जाता है। Blinkit जैसी कंपनियों ने “10-मिनट डिलीवरी” को अपना सबसे बड़ा यूएसपी बना लिया है। लेकिन इस सुविधा के पीछे जिन लोगों की मेहनत, जोखिम और मानसिक दबाव छिपा है, उसकी झलक हाल ही में तब सामने आई जब राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने खुद एक दिन Blinkit डिलीवरी पार्टनर बनकर काम किया।
National Khabar, Desk report
Blinkit 10-Min Delivery: राघव चड्ढा का अनोखा प्रयोग
राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने अपने आधिकारिक X (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर एक वीडियो टीज़र साझा किया, जिसमें उन्होंने खुलासा किया कि वे एक दिन के लिए Blinkit डिलीवरी एजेंट बने। उनका मकसद था—गिग इकॉनॉमी में काम कर रहे डिलीवरी पार्टनर्स की असली चुनौतियों को नज़दीक से समझना।
चड्ढा ने वीडियो में लिखा,
“मैंने एक दिन डिलीवरी पार्टनर के रूप में जिया और ‘10-मिनट डिलीवरी’ के वादे से पैदा होने वाले दबाव, जोखिम और चुनौतियों को अपनी आंखों से देखा। इस वादे के पीछे की हकीकत कुछ और ही है।”
Blinkit 10-Min Delivery: डिलीवरी बॉय की जुबानी दबाव की कहानी
वीडियो में राघव चड्डा Blinkit के कई डिलीवरी राइडर्स के साथ बैठे दिखाई देते हैं। इसी दौरान एक डिलीवरी बॉय बेहद बेबाकी से उस दबाव के बारे में बताता हैं,जिसका सामना उन्हें रोज़ाना करना पड़ता हैं।
डिलीवरी पार्टनर कहते हैं,
“कंपनी कहती हैं कि 10 मिनट में डिलीवरी का कोई दबाव नहीं हैं,लेकिन जब उनके यूनिफार्म पर ही ’10-Minute Delivery’ लिखा होता हैं,तो दबाव अपने आप बन जाता हैं। “
यह एक साधारण-सा बयान नहीं बल्कि उस मानसिक दबाव की सच्चाई हैं,जो हर ऑर्डर के साथ बढ़ता जाता हैं।
Blinkit 10-Min Delivery: टैगलाइन बनाम सच्चाई
कागजों और आधिकारिक बयानों में कंपनियों यह दावा करती हैं कि डिलीवरी पार्टनर्स पर समय का कोई जोर नहीं होता। लेकिन ज़मीनी हकीकत अलग हैं।
ग्राहक जब “10 मिनट” पढ़कर ऑर्डर करता हैं,तो उसकी उम्मीदें भी हिसाब से बढ़ जाती हैं। देर होने पर शिकायत,रेटिंग गिरना और कभी-कभी डिलीवरी पार्टनर से बहस-ये सब आम बातें हैं।
डिलीवरी बॉय के मुताबिक,
ऑर्डर देर होने पर ग्राहक नाराज़ होता हैं
ऐप ऐप पर परफॉर्मेंस रेटिंग प्रभावित होती है
बोनस और इंसेंटिव पर असर पड़ता है
बार-बार देरी होने पर अकाउंट पर चेतावनी तक मिल सकती है
Blinkit 10-Min Delivery: सड़क पर दौड़ती ज़िंदगी
10 मिनट की डिलीवरी पूरी करने के चक्कर में डिलीवरी पार्टनर्स को ट्रैफिक, खराब सड़कों और मौसम की मार झेलनी पड़ती है। बारिश, धूप या ठंड—ऑर्डर हर हाल में समय पर पहुंचाने का दबाव बना रहता है। राघव चड्ढा ने भी अपने अनुभव में महसूस किया कि ट्रैफिक नियमों का पालन करना और समय पर डिलीवरी करना एक साथ बेहद मुश्किल है ज़रा-सी देरी पूरे सिस्टम में तनाव पैदा कर देती है
हादसे का खतरा हमेशा बना रहता है
गिग इकॉनॉमी की कड़वी सच्चाई
Blinkit ही नहीं, बल्कि ज़्यादातर क्विक-कॉमर्स और फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म गिग वर्कर्स पर आधारित हैं। ये वर्कर्स स्थायी कर्मचारी नहीं होते, इसलिए, न तो उन्हें सामाजिक सुरक्षा मिलती है, न स्वास्थ्य बीमा की पुख्ता व्यवस्था, न ही तय वेतन की गारंटी 10 मिनट की डिलीवरी जैसी आक्रामक समय-सीमा इस असुरक्षा को और बढ़ा देती है।
राघव चड्ढा का संदेश
इस वीडियो के ज़रिए राघव चड्ढा ने सिर्फ एक अनुभव साझा नहीं किया, बल्कि एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया—
क्या उपभोक्ता की सुविधा के लिए डिलीवरी पार्टनर्स की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य से समझौता किया जाना सही है?
उन्होंने इशारों-इशारों में यह भी कहा कि नीति-निर्माताओं, कंपनियों और समाज—तीनों को मिलकर गिग वर्कर्स के लिए बेहतर और सुरक्षित सिस्टम बनाना होगा।
ग्राहकों की भी ज़िम्मेदारी
इस पूरी बहस में ग्राहकों की भूमिका भी अहम है। 10 मिनट की डिलीवरी का मतलब यह नहीं कि डिलीवरी पार्टनर कोई मशीन है।
थोड़ी-सी देरी पर गुस्सा करने के बजाय समझदारी दिखाना,सभ्य व्यवहार करना और अच्छी रेटिंग देना -ये छोटे कदम डिलीवरी पार्टनर्स का मनोबल बढ़ा सकते हैं।
Blinkit की 10 मिनट डिलीवरी का वादा भले ही मार्केटिंग के लिए आकर्षक हो,लेकिन इसके पीछे काम कर रहे डिलीवरी पार्टनर्स की ज़िंदगी आसान नहीं है। राघव चड्डा का यह कदम एक आईना है,जो हमें क्विक-कॉमर्स की चमक के पीछे छिपी हकीकत दिखाता है।