
Report by : Sakshi Singh, National Khabar
- माघ मेला : आस्था, व्यवस्था और टकराव
- प्रशासन की सख्ती : नियम, कानून और संदेश
Shankaracharya Avimukteshawar Anand : माघ मेले का विवाद,’ ‘कालनेमी’ बयान और संतों पर राजनीति : मतभेद या रणनीति ?
Shankaracharya Avimukteshawar Anand : प्रयागराज माघ मेले में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच उपजा विवाद अब केवल धार्मिक या प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है,बल्कि यह उत्तर प्रदेश की राजनीति के शीर्ष नेतृत्व के बीच बयानों की जंग का रूप ले चुका है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के अलग-अलग सुरों ने सियासी गलियारों में एक नई बहस को जनम दे दिया है -क्या यह नेतृत्व के भीतर मदभेद का संकेत है या फिर सोची-समझी राजनीतिक रणनीति ?
Shankaracharya Avimukteshawar Anand : माघ मेला : आस्था,व्यवस्था और टकराव
माघ मेला प्रयागराज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का अहम प्रतिक है। इसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक ‘यज्ञ’ की संज्ञा देते रहे हैं, जहां आस्था, अनुशासन और प्रशासनिक व्यवस्था का संतुलन आवश्यक माना जाता है। इसी माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच कुछ मुद्दों को लेकर टकराव सामने आया। शंकराचार्य की आपत्तियों और प्रशासन की सख्ती ने मामला तूल पकड़ लिया।
Shankaracharya Avimukteshawar Anand : सीएम योगी का ‘कालनेमि’ बयान: सख्त संदेश
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने एक हालिया संबोधन में रामचरितमानस के पात्र ‘कालनेमि’ का उल्लेख किया। पौराणिक कथा में कालनेमि वह राक्षस था जिसने साधु का वेश धरकर हनुमान जी को भ्रमित करने की कोशिश की थी। योगी आदित्यनाथ के इस बयान को प्रतीकात्मक माना गया—उनका संदेश स्पष्ट था कि जो भी माघ मेले जैसे पवित्र आयोजन में बाधा डालेगा, वह कालनेमि के समान है।
हालांकि, कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान सीधे तौर पर किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि उन तमाम तत्वों के खिलाफ था जो व्यवस्था को बाधित करने का प्रयास कर रहे हैं। फिर भी, बयान का समय और संदर्भ ऐसा था कि इसे शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के प्रकरण से जोड़कर देखा जाने लगा।
Shankaracharya Avimukteshawar Anand : प्रशासन का रुख: पीछे हटने के मूड में नहीं
इस पूरे विवाद में प्रशासन और मुख्यमंत्री कार्यालय का रुख बेहद सख्त नजर आया। संदेश साफ था—आस्था का सम्मान होगा, लेकिन कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक निर्णयों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। योगी सरकार पहले भी यह संकेत देती रही है कि संत हों या संगठन, नियम सभी के लिए समान हैं।
Shankaracharya Avimukteshawar Anand : डिप्टी सीएम केशव मौर्य का नरम अंदाज
जहां मुख्यमंत्री योगी का बयान ‘टफ’ माना गया, वहीं डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का रुख इससे बिल्कुल अलग नजर आया। उन्होंने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ‘पूज्य संत’ बताते हुए उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया और यहां तक कहा कि वे उनके चरण स्पर्श भी कर सकते हैं। यह बयान सामने आते ही सियासी चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया।
Shankaracharya Avimukteshawar Anand : सवाल बड़ा है: मतभेद या रणनीति?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच वैचारिक मतभेद हैं? या फिर यह ‘गुड कॉप–बैड कॉप’ जैसी राजनीतिक रणनीति है?
राजनीतिक जानकारों का एक वर्ग मानता है कि यह कोई मतभेद नहीं, बल्कि संत समाज और आम जनमानस को साधने की रणनीति है। योगी आदित्यनाथ का कड़ा रुख प्रशासनिक मजबूती और कानून के पालन का संदेश देता है, जबकि केशव मौर्य का नरम अंदाज संत समाज को यह भरोसा दिलाता है कि सरकार उनके सम्मान और भावनाओं को समझती है।
Shankaracharya Avimukteshawar Anand : संत समाज और भाजपा की राजनीति
उत्तर प्रदेश में संत समाज का प्रभाव हमेशा से रहा है। भाजपा ने भी वर्षों से संतों और धार्मिक संगठनों के साथ अपना मजबूत संबंध बनाए रखा है। ऐसे में किसी बड़े संत से टकराव पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। संभव है कि डिप्टी सीएम केशव मौर्य का बयान इसी संतुलन को साधने की कोशिश हो।
विपक्ष की नज़र और मौका
विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नज़र बनाए हुए है। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के अलग-अलग सुरों को विपक्ष ‘अंदरूनी खींचतान’ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि भाजपा नेतृत्व की ओर से अभी तक इसे मदभेद मानने से इंनकार किया जा रहा है।
आगे क्या ?
फ़िलहाल यह साफ है कि माघ मेले का यह विवाद जल्द शांत होने वाला नहीं है। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद,प्रशासन और सरकार-तीनों के अगले कदम पर सबकी नज़र टिकी है। क्या सरकार कोई संवाद का रास्ता निकालेगी, या फिर सख्त रुख पर कायम रहेगी—यह आने वाले दिनों में तय होगा।
सीएम योगी आदित्यनाथ का ‘कालनेमी’ बयान और डिप्टी सीएम केशव मौर्य का संतों के प्रति नरम रुख पहली नज़र में विरोधाभासी लग सकता है,लेकिन यूपी की राजनीति में इसे संतुलन और रणनीति के रूप में भी देखा जा सकता है।एक ओर सख्ती से व्यवस्था का संदेश,तो दूसरी ओर सम्मान और संवाद की पहल-शायद यही भाजपा की दोहरी रणनीति है। अब देखना यह होगा कि यह रणनीति सरकार के लिए कितनी कारगर साबित होती है।