Tuesday, April 9, 2024
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जानिए 1975 की इमरजेंसी का पूरा सच, वो मशहूर अभिनेत्री जो कांग्रेस राज में जेल में रोया करती थी

रिपोर्ट- भारती बघेल

25 जून 1975 रायसीना हील्स… किसे पता था कि इसी रायसीना हील्स की सड़क से जब इंदिरा गांधी का काफिला गुजरेगा तो हिंदुस्तान की तारीख में एक ऐसा काला दिन दस्तक देगा जिसके बाद हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की नजर हिंदुस्तान की इस नई पहचान के साथ जुड़ जाएगी। और उसका नाम और कुछ नहीं इमरजेंसी शब्द होगा। नमस्कार मेैं हूं भारती बघेल नेशनल खबर में आपका स्वागत है।

उठते हैं तूफान, बवंडर भी उठते
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटी चढ़ाती है
दो राह, समय के रथ की घर्घर नाथ सुनो
सिहासन खाली करो कि जनता आती है

25 जून 1975 की शाम ढलते ढलते जब दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की जुबान से राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की ये कविता फूटी. तो एक सफदरजंग रोड पर बैठी तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपनी गद्दी हिलती दिखी। इंदिरा डरी हुईं थीं, और सत्ता जाने के डर में उन्होंने वह कदम उठाया जो आजादी के बाद का सबसे काला दिन साबित हुआ। वह भूल गई कि 28 साल पहले उनके ही पिता जवाहर लाल नेहरू ने आजाद भारत के लोकतंत्र का नियति से मिलन करवाया था।

उन नजारों को इंदिरा की बाल आंखों ने भी तब देखा था। लेकिन हर हाल में सत्ता में बने रहने की लालसा में 28 साल बाद उन्होंने देश में आंतरिक आपातकाल लागू कर दिया।

इत्तेफाक देखिए जिन जवाहरलाल नेहरू ने देश में लोकतंत्र का दीपक जलाया, उन्हीं की बेटी इंदिरा गांधी ने जम्हूरियत का जनाजा निकाल दिया। उस दौर के नेता अब के दौर में भी उस दिन को याद करते हैं। किसे पता था कि इंदिरा गांधी की जागीर में हिंदुस्तान तब्दील हो जाएगा। संसद बेईमानी हो जाएगी। सड़क के संघर्ष जेल खाने में तब्दील कर दिए जाएंगे।

25 जून 1975 दिल्ली का रामलीला मैदान। जयप्रकाश नारायण की जनसभा। वह एक बेहद गर्म दिन था। मौसम के लिहाज से ही नहीं राजनीति सरगर्मियां भी दिल्ली के सियासी पारे को बढ़ा रही थी। इंदिरा गांधी की सरकार के भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और सत्ता के लिपसा खिलाफ जयप्रकाश नारायण की सभा उस शाम रामलीला मैदान में हुई।

73 साल की ढलती उम्र और उस पर से बीमारी। जेपी ने अपने कमजोर लेकिन आत्मविश्वास से भरी आवाज में सेना और पुलिस को भी नसीहत दी कि हुकूमत के गलत फैसलों में साथ ना दें। तब जे पी की शपथ पर लाखों हाथ मुट्ठी बांधकर खड़े हो गए। जेपी ने उसी मंच पर लोकसंघर्ष समिति बना दी और मोरारजी देसाई को चेयरमैन बना दिया। नानाजी देशमुख महासचिव और अशोक मेहता कोषाध्यक्ष बनाए गए। इन सब से घबराईं इंदिरा ने जेपी के बोल को पकड़ लिया, कि सेना और पुलिस सरकार की गैरकानूनी और असंवैधानिक आदेशों को ना माने।

सूरज की रोशनी में घना अंधियारा जेपी रामलीला मैदान में महसूस कर रहे थे। इसलिए पहली बार ही उन्होंने इस रामलीला मैदान में जिक्र किया था कि हमला चाहे जैसा हो हाथ हमारा नहीं उठेगा। जेपी ने लोगों को शपथ दिलाई और उसके बाद इंदिरा की तानाशाही खत्म करने की दिशा में कदम भी बढ़ा दिए। और यहीं पर उन्होंने दिनकर की उस कविता को दोहराया था जिसमें बहुत साफ एलान था कि सिंहासन खाली करो, जनता आती है।

जेपी पर राष्ट्रद्रोह के आरोप लगा दिए गए। और देश को कैसे साधना है। सत्ता में कैसे बने रहना है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद जिस डर को इंदिरा जी रही थी उसे जे पी के इसी वक्तव्य से एक थाह मिल गई। यानी पहले गुजरात और फिर बिहार। जेपी की अगुवाई में आंदोलन से डरी इंदिरा गांधी को लगा कि जेपी उनके पैरों तले की मजबूत सियासी जमीन को खिसकाना चाहते हैं। और उनके इस डर को हवा दी उनकी उस कोटरी ने जिसे इंदिरा का किचन केबिनेट कहते हैं। दरअसल उस वक्त दो किस्म की कोटरी काम कर रही थी। एक इंदिरा गांधी की दूसरी उनके छोटे बेटे संजय गांधी की। लेकिन दोनों की मंजिल एक ही थी इंदिरा की सत्ता। संजय का वर्चस्व।

25 जून की दोपहर जेपी की रैली से पहले ही आपातकाल के लिए गुपचुप तरीके से पूरे इंतजाम कर लिए गए। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निजी सचिव आरके धवन, हरियाणा के मुख्यमंत्री बंशीलाल, केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ओम मेहता और दिल्ली के एसीपी सीआईडी के बाजू बाई इकट्ठे हुए। इसी दौरान दिल्ली के उपराज्यपाल किशन चंद ने शाम 7:30 बजे मुख्य सचिव जेके कोहली, आईजी और डीआईजी के साथ एक बैठक की। उसके घंटे भर बाद मुख्य सचिव तिहाड़ जेल पहुंचे उन्होंने जेल सुप्रिडेंट को बता दिया कि कल तड़के तक 200 नए कैदियों के लिए जेल में जगह बनाकर रखी जाए।

उधर जेपी की रैली खत्म भी नहीं हुई और इधर इंदिरा गांधी सीधे राष्ट्रपति भवन पहुंचीं। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से मिलने या कहें कि उन्हें इमरजेंसी लगाने की पूर्व सूचना देने। तब रात के 8:00 बज रहे थे। उन्होंने राष्ट्रपति से कहा कि अगर इस देश के भीतर इमरजेंसी लागू नहीं की गई तो देश खतरे में पड़ जाएगा। यानी आपातकाल लागू करना देश को बचाने का तरीका है। और राष्ट्रपति ने भी चूं तक नहीं की।

लेकिन हद तो तब हुई जब इंदिरा गांधी ने कहा अगले 2 घंटे में आपके पास वह ड्राफ्ट पहुंच जाएगा। आप उस पर साइन कर दीजिएगा। 2 घंटे बाद ड्राफ्ट आया। राष्ट्रपति महोदय ने उस पर हस्ताक्षर किए। और देश में इमरजेंसी लग गई।

वहीं रात के 1:30 बजे थे और जेपी नारायण के घर को पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया था। असल में पुलिस जेपी नारायण की गिरफ्तारी का वारंट लेकर आई थी। जेपी को नींद से जगाया गया। और पुलिस उन्हें संसद मार्ग थाने ले गई। राधाकृष्णन ने फोन करके चंद्रशेखर को इसकी जानकारी दी। चंद्रशेखर उस वक्त कांग्रेस के सांसद थे।

जब चंद्रशेखर थाने पहुंचे तब उनको पता चला चला कि जे.पी को ही नहीं उनको भी गिरफ्तार कर लिया है। 26 जून की सुबह 8:00 बजे इंदिरा गांधी ने रेडियो पर आकर बताया कि देश में आपातकाल लागू हो गया है। तब तक इंदिरा गांधी के विरोधी तमाम नेताओं को सलाखों के पीछे पहुंचाने की तैयारी कर ली गई थी।

कमाल की त्रासदी रही इस देश के साथ। आजादी मिली तो आधी रात को। देश में इमरजेंसी लगी तो आधी रात को।

गिरफ्तारी के बाद जेपी को हरियाणा के सोहना गेस्ट हाउस में ले जाकर रखा गया ।वहीं पर इंदिरा गांधी से प्रधानमंत्री पद की लड़ाई लड़ने वाले मोरारजी देसाई को भी रखा गया था। लेकिन जे पी और मोरारजी देसाई को मिलने नहीं दिया गया। दूसरी तरफ 26 जून की सुबह होते-होते तमाम बड़े नेता जेल में थे। मीसा के तहत 36000 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया। ढाई हजार लोग तो बिहार से ही गिरफ्तार हुए। हालांकि इंदिरा विरोधी नेताओं का कहना है कि इंदिरा की जेलों में जगह कम पड़ गई थी, क्योंकि गिरफ्तारियां बहुत बड़ी थीं।

इंदिरा को लगा कि विरोधी नेताओं को गिरफ्तार करके उन्होंने विरोध के मुंह पर ताला लगा दिया है। लेकिन इंदिरा की सत्ता चौकड़ी में वह दम नहीं था जो लोकतंत्र का दम निकाल सके।

जाते- जाते हम आपको बता दें कि इमरजेंसी के दौरान जेल में बंद बड़े नामों में 1 नाम मशहूर कन्नड़ अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी का नाम भी था। जिनकी चीखें जेल में सुनाई देती थीं। उनका गुनाह था कि उन्होंने इमरजेंसी का विरोध किया था। वह समाजवादी धारा से जुड़ी हुईं थीं। और सरकार को यह शक था कि वह जॉर्ज फर्नांडिस के बारे में जानती थीं।

जॉर्ज उस वक्त उस वक्त के मशहूर समाजवादी नेता थे। और सरकार बड़ौदा डायनामाइट केस में उनकी तलाश कर रही थी। स्नेहलता रेड्डी को लगातार यातनाएं दी गई। जबकि सच यह है कि जो फाइनल चार्जशीट दायर हुई उसमें उनका नाम ही नहीं था। और इमरजेंसी खत्म होने के कुछ ही वक्त बाद स्नेहलता रेड्डी जेल में बिताए उन पलों की वजह से चल बसी। उनके फेफड़े उनके गुर्दे बुरी तरह खराब हो चुके थे।

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