Saturday, April 13, 2024
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पांच राज्यों में हैं चुनाव करीब, मतदाताओं के मन में कौन सा है चुनाव चिन्ह ?

रिपोर्ट- भारती बघेल

जैसे- जैसे पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा के चुनाव पास आ रहे हैं। राजनीतिक दलों की सरगर्मियां और जनता की उत्सुकता बढ़ती जा रही है। पिछली बार इन राज्यों में चुनाव आयोग द्वारा चार जनवरी, 2017 को चुनावों की घोषणा से चुनावी प्रक्रिया शुरु हुई थी। चुनावों में दलों की विजय- पराजय होती रहती है, पर महत्व नूतन प्रवृत्तियों का होता है। कुछ दिनों पूर्व बंगाल चुनावों में ममता बनर्जी फिर सत्ता पर काबिज हो गई, पर वामपंथ के गढ़ में वाम दलों का सफाया हो गया।

लेफ्ट ऑफ द सेंटर कही ज़ाने वाली भाजपा 39 प्रतिशत वोट और 77 सीटें पाकर मजबूत विपक्ष के रुप में उभरी। इसी प्रकार 2019 लोकसभा चुनावों में भाजपा की विजय हुई थी, पर उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह था कि भारतीय लोकतंत्र में अस्मिता या पहचान की राजनीति को विस्थापित कर आकांक्षा की राजनीति ने जन्म ले लिया। राजनीतिक दलों के परंपरागत जनाधार में आमूलचूल परिवर्तन हो रहा है और अस्मिता की राजनीति करने वाले दलों के हाथ से सजातीय मतदाता छिटक रहा है। अस्मिता की राजनीति बहुत हुई। अब आकांक्षाओं के परवान चढ़ने का वक्त है। अस्मिता से सशीक्तीकरण का रास्ता आकांक्षाओं की पगडंडी से जाता है, जिस पर देश का गरीब, दलित, पिछड़ा और उपेक्षित मतदाता चल पड़ी है, पर ऐसा हुआ क्यों..क्या राजनीति में जातीयता का लोप हो रहा है। क्या मतदाता जाति से वर्ग की ओर मुड़ रहा है।

अभी भी ज्यादातर विश्लेषक जातीय गणक को सामने रख मतदान व्यवहार का विश्लेषक करना चाहते हैं..वे मतदाता को ये अधिकार नहीं देना चाहते कि वह स्वतंत्र नागरिक के रुप में भी मतदान कर सकें। लेकिन गहराती लोकतांत्रिक जड़ें धीरे- धीरे मतदाता को सामाजिक संरचना के खांचे से निकाल कर नूतन राजनीति संरचनाओं के खांचे से निकाल कर नूतन राजनीतिक संरचनाओं के खांचे में डालने लगी हैं। जमीनी हकीकत बदल रही है। मतदाता के अपने जीवन में धीरे- धीरे गुणात्मक परिवर्तन दिख रहा है। आज भारत सरकार के 54 मंत्रालयों की 311 याजनाओं द्वारा जनधन खातों में सीधे भेजी जाने वाली राशि का लाभ एक ऐसे बड़े गरीब वर्ग के मिल रहा है, जो मीडियाके केंद्र में नहीं है।

कुछ ही वर्षों में 50-60 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा जनता का पैसा सरकार ने बचाया है, जो पहले बिचौलियों के पास या फर्जी खातों में जाता था। राज्यों में भी सरकारी योजनाएं जनधन खातों में सीधे धन भेज रही हैं, जैसे उत्तर प्रदेश ने 135 योजनाओं के तहत 2.73 लाख करोड़ रुपये की धनराशि सीधे जनधन खाते में भेजी। इसके अतिरिक्त आयुष्मान , ग्रामीण आवास, शहरी आवास, फसल बीमा, मुद्रा, जन औषिधि, शौचालय आदि योजनाओं का लाभ जमीन पर दिख रहा है। जो लोग इसके लाभार्थी हैं, उनके लिए जाति महत्वपूर्ण होगी या सामाजिक आर्थिक सुरक्षा देने वाले ये लाभ।

वास्तव में एक अदृश्य मतदाता समूह प्रकट हो गया है, जो सामाजिक स्तर पर अपनी जातीयता को पकड़े है, लेकिन राजनीतिक स्तर पर उसे छोड़ने को तैयार है। यही वह मनोवैज्ञानिक परिवर्तन है, जो अस्मिता की राजनीति करने वाले दल अभी तक समझ नहीं पा रहे हैं और वे पुराने प्रयोग में ही उलझे हैं। इसी में चुनावी विजय और पराजय के सूत्र छिपे हैं। देश में अस्मिता और आकांक्षा के मिलन का एक इतिहास है। स्वतंत्रता के पूर्व अंग्रेजों से लड़ाई में जिन अमर शहीदों ने बलिदान दिया, वे अस्मिता और आकांक्षा दोनों ही लड़ाई लड़े। उन्हें भारतीय अस्मिता चाहिए थी और उनकी आकांक्षा थी कि अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिले, जिससे वे स्वतंत्र भारत में खुली हवा में सांस ले सकें। उनकी अस्मिताएं राष्ट्रीय और आकांक्षाएं सामूहिक थीं। स्वतंत्रता के बाद यदि हमसे सबसे बड़ी भूल हुई तो यह कि हमने लोकतांत्रिक स्पर्धा द्वारा राष्ट्रीय अस्मिता को अनेक सामाजिक अस्मिताओं में बांट दिया और सामूहिक आकांक्षाओ को क्षेत्रीय, भाषाई, जातीय और वैयक्तित्व आकांक्षाओं की शक्ल दे दी।

कांग्रेस के पास अवसर था, क्योंकि वह राजनीतिक दल नहीं, वरन राष्ट्रीय आंदोलन था। उसे समाज का इंद्रधनुषीय गठबंधन कहा जाता था, क्योंकि इसमें सामाजिक वर्गों और समूहों का समावेश था, लेकिन गांधी जी की इच्छा के विरुध्द जब कांग्रेस का राष्ट्रीय आंदोलन से राष्ट्रीय दल में रुपांतरण हुआ तो वह समाज के सभी घटकों को सत्ता संरचना में समुचित स्थान न दे सकी, जिससे सिसकती अस्मिताएं और उपेक्षित आकांक्षाएं अवसर पाकर कांग्रेस से अलग हो गईं। इसी कारण आज कांग्रेस की यह दुर्दशा है। जिस समावेशी राजनीति की आज बात होती है, वह तो हमारी थाती है, जिसे कांग्रेस ने नष्ट कर दिया। जो अपनी विरासत को ही नष्ट करे, उसका नाश अवश्यंभावी है।

आज देश में संवैधानिक संस्थाओं का ही नहीं वरन जन आस्थाओं का भी लोकतंत्रीकरण हो रहा है। अस्मिता की राजनीति सामंतवादी सामाजिक संरचना और मनोवृत्ति की देन है, जो किसी जातीय, भाषाई, धार्मिक या क्षेत्रीय समूह को एक राजनीतिक दल से स्थायी रुप से प्रतिबध्द कर उसके चयन के विकल्पों को खत्म कर देती है। लोकतंत्र की मांग है कि मतदाता के सामने चयन के विकल्प खुले हों और वह उनमें से किसी विकल्प का चयन करने को स्वतंत्र हो। ऐसा करने में जरुरी नहीं कि उस पर कोई बाहा अवरोध हो। वह अपने संस्कार और अपने मनोविज्ञान का भी बंधक हो सकता है, लेकिन जब हम संकीर्ण जातीय बंधन को तोड़ संपूर्ण समाज को अलिंगन करते हैं। और समाज भी हमें गर्मजोशी और सौहार्द के साथ स्वीकार करें जो जातीय प्रतिबध्दताओं के बावजूद हमारे राजनीतिक विकल्प खुल जाते हैं।

ऐसा सौहार्द परिस्थतियां पैदी करती हैं, जैसे- राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय आपदा या कोई स्थानीय चुनौती जिससे सभी ने मिलकर लड़ा हो।ऐसे प्रत्येक कठिन समय में गजब की सामाजिक समरसता और सौहार्द पैदा हो जाता है और वैसी एकता एवं अखंडता पैदा हो जाती है, जिसका उल्लेख हमारे संविधान की प्रस्तावना करती है। अस्मिता के ऊपर हावी होती आकांक्षा की यह प्रवृत्ति आगामी चुनाव स्पर्धा को अवश्य प्रभावित करेगी।

एक ऐसे समय जब सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में शीघ्र ही विधानसभा चुनाव होने हैं तब लोगों के मानस में आ रहे बदलाव को भांपना जरुरी है। इसी को ध्यान में रखकर हमने समुदायों पर केंद्रित अध्ययन के माध्यम से जनता की राजनीतिक अभिवृत्तियों में आ रहे परिवर्तन को समझने का प्रयास किया। इसी में एक महत्वपूर्ण समुदाय रहा मुस्लिम समुदाय।

मुसलमानों को हम प्राय: एक समरुपी समुदाय मानते हैं। मुस्लिम वोट जैसे खांचों में हम उनकी व्याख्या करते हैं। जबकि मुस्लिम समुदाय की संरचना उसे बहुल रुपी समाज के रुप में प्रस्तुत करती है। उसमें भी जाति एवं वर्ग जैसी विविधता पाई जाती है।जैसे- भारतीय समाज के अन्य समुदायों में मिलती है।अशरफ, अलजाफ एवं अरजाल जैसे सामाजिक स्तरों में तो मुस्लिम समुदाय बंटा है ही, ततवा, रंगरेज, जोगी, डफाली, ललबेगी और बुनकर जैसे पेशे से बनी अनेक जातियां एवं उनके प्रतिस्पर्धी टकरावों की ध्वनि इस समूह के तानेबाने में प्रतिध्वनित होती है।

जब कोई भी समूह इतने स्तरों में बंटा है तो धार्मिक अस्मिता पर केंद्रित गहन गोलबंदी के बावजूद उसके बीच कायम राजनीति असहमति के स्वर सुनाई पड़ते हैं। आजादी के तुरंत बाद जहां अशरफ मुस्लिम राजनीति के प्रभावी थे, वहीं मंडल आयोग के बाद फैली राजनीतिक चेतना के प्रभाव से इस समूह के पिछड़े एवं सीमांत समूह जैसे अंसारी, बुनकर आदि राजनीति में सक्रिय एवं प्रभावी होने लगे। अब तो मुस्लिम राजनीति में पसमांदा की ओर में राजनीति में भागीदारी की आवाज उठने लगी है।

आपको बतादें कि एक समूह मुस्लिम बस्तियों में ऐसा भी है, जो बीजेपी की तारीफ करता है, क्योंकि उसके पास कई योजनाओं का लाभ पहुंचा हैं। ऐसे परिवारों में धार्मिक एवं जातीय अस्मिता की चेतना के साथ- साथ लाभार्थी होने का भाव भी बनने लगा है। हालांकि उनकी लाभार्थी चेतना के निर्माण एवं उभार की प्रक्रिया अभी धीमी है। संभव है ये भाजपा की तारीफ करने के बावजूद वोट किसी और को दें, किंतु यह भी हो सकता है कि इनमें से अनेक भाजपा को वोट दें। ये ग्रामीण मुस्लिम परिवार गरीब परिवार है, जो जनतांत्रिक राजनीति में लाभार्थी के रुप में धीरे- धीरे रुपांतरित होते जा रहे हैं। हालांकि इनमें मध्यम वर्गीय एवं ओबीसी मुस्लिम मतदाताओं का एक वर्ग भी दिखा, जो या तो सपा के पक्ष में गोलबंद हो रहा है या फिर होने की तैयारी में है। इनमें एक तीसरा समूह जिसमें मूलत: मध्य आयुवर्ग एंव उम्रदराज लोग थे, वे कांग्रेस शासन को याद कर रहे थे। ऐसे में मुस्लिम वोट के एकरुपी या समरुपी होने को मिथक माना जाना चाहिए।

अक्सर ये कहा जाता है कि मुस्लिम एक होकर मतदान करते हैं, लेकिन अब यह बात सही नहीं लगती क्योंकि शिया और सुन्नी ये जो दो सुदाय हैं इसकी राजनीतिक पसंद अलग अलग हैं। और इस बात को पहले ही मान्यता मिल गई है और आज नहीं तो कल मुस्लिम समाज की विविधता राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनेगी। मुस्लिमों के किसी एक दल के पक्ष में रणनीतिक रुप से मतदान की धारणा भी उचित नहीं लगती। कई जानकार मानते हैं कि इस रणनीति के मूल में भाजपा या हिंदुत्व की राजनीति करने वाले दल बनाम अन्य होते हैं। चुनावी मीमांसा के कुछ ऐसे संकेत उभरते हैं, किंतु अब यह धुरा भी खिसक रही है। यह रुपांतरण इसलिए हो रहा है, क्योंकि जनतंत्र संवयं में अपनी एक आत्मचेतना रचता है। वह धीरे धीरे ही सही अपनी जनता बनाता जाता है, जो विशेष जाति, वर्ग, या धर्म जगह बनाने लगते हैं।

सत्ता संचालित जनतंत्र इन समूहों में एक दूसरा वर्ग भी रचता है, जिसे हम प्रशासजनित विकास की भाषा में एस्पिरेंट यानी आकांक्षी समूह कहते हैं।यह समूह आगे बढ़ने की चेतना से लैस होता है, जिसमें जाति, धर्म, सुरक्षा एनं विकास की चाह सङी में एक दूसरे से आबध्द होती है।

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