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UGC का नया नियम क्या है ?

Report by : Sakshi Singh, National Khabar

  • UGC का नया नियम क्या है?
  • जिस बदलाव पर मचा बवाल, मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा
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UGC :- जिस बदलाव पर मचा बवाल,इस्तीफे से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक क्यों पंहुचा मामला

नई दिल्ली

UGC :- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के एक नए नियम ने देशभर में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया से लेकर अदालतों तक इस बदलाव का तीखा विरोध देखने को मिल रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस नियम के विरोध में अपने पद से इस्तीफा तक दे दिया। वहीं, सुप्रीम कोर्ट में भी इस नियम के खिलाफ जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है, जिसमें इसके कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक बताया गया है।

सोशल मीडिया पर #UGCRollback ट्रेंड कर रहा है और छात्र, शिक्षक, अधिकारी तथा सामाजिक संगठन इस नियम को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर UGC का यह नया नियम है क्या, और इसे लाने की जरूरत क्यों पड़ी?

क्या है UGC का नया नियम?

UGC ने उच्च शिक्षा से जुड़े कुछ मानकों और पात्रता नियमों में बदलाव किया है, जिसका सीधा असर विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, शोधार्थियों और प्रशासनिक सेवाओं में जाने वाले अभ्यर्थियों पर पड़ता है।

नए नियम के तहत—

उच्च शिक्षा में पात्रता, प्रमोशन और नियुक्ति से जुड़े मापदंडों को बदला गया है
कुछ शैक्षणिक योग्यताओं को सीमित या अनिवार्य किया गया है
शोध, पीएचडी और शिक्षण से जुड़ी शर्तों में सख्ती लाई गई है
कुछ वर्गों को मिलने वाले अवसरों को लेकर असमानता बढ़ने का आरोप लगाया जा रहा है

यही कारण है कि इसे लेकर यह कहा जा रहा है कि नया नियम समान अवसर के सिद्धांत के खिलाफ है।

सोशल मीडिया पर क्यों भड़का विरोध?

UGC के नए नियम सामने आते ही छात्रों और शिक्षकों में असंतोष फैल गया। देखते ही देखते सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर), फेसबुक और इंस्टाग्राम पर #UGCRollback ट्रेंड करने लगा।

लोगों का आरोप है कि—

यह नियम मेरिट के नाम पर भेदभाव को बढ़ावा देता है
ग्रामीण और सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए रास्ते और कठिन हो जाएंगे
शिक्षा को समावेशी बनाने के बजाय सीमित किया जा रहा है

कई शिक्षाविदों ने इसे “ग्राउंड रियलिटी से कटे हुए नियम” करार दिया।

सुप्रीम कोर्ट तक क्यों पहुंचा मामला?

UGC के नए नियम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि—

यह नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है
कुछ प्रावधान भेदभावपूर्ण और मनमाने हैं
इससे शिक्षा का अधिकार और समान अवसर प्रभावित होता है

याचिका में कोर्ट से आग्रह किया गया है कि इन नियमों पर रोक लगाई जाए या इन्हें रद्द किया जाए।

सिटी मजिस्ट्रेट का इस्तीफा क्यों बना बड़ा मुद्दा?

इस पूरे विवाद को और गंभीर तब बना दिया जब उत्तर प्रदेश के बरेली में तैनात सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने UGC के नए नियम के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

उन्होंने अपने इस्तीफे में कहा कि—

यह नियम सामाजिक समानता के सिद्धांतों के खिलाफ है
एक संवैधानिक पद पर रहते हुए वह ऐसे बदलावों का समर्थन नहीं कर सकते
यह नियम भविष्य की पीढ़ियों के साथ अन्याय है

किसी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी का इस तरह खुले तौर पर इस्तीफा देना इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस में ले आया।

UGC को इस बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?

अब सवाल उठता है कि आखिर UGC को यह नया नियम लाने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

UGC के अनुसार—

उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में एकरूपता लाना जरूरी था
अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप शिक्षा प्रणाली को ढालना उद्देश्य है
शोध और शिक्षण में गुणवत्ता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए सख्ती जरूरी थी
फर्जी डिग्री, कमजोर शोध और अनियमित नियुक्तियों पर रोक लगाना मकसद था

UGC का दावा है कि ये नियम शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए लाए गए हैं, न कि किसी वर्ग को नुकसान पहुंचाने के लिए।

विरोध करने वालों की दलील क्या है?

नए नियम के विरोध में खड़े लोगों का कहना है कि—

गुणवत्ता सुधार के नाम पर अवसरों को सीमित किया जा रहा है
पहले से मौजूद असमानताओं को यह नियम और गहरा करेगा
हर छात्र या शिक्षक के पास समान संसाधन नहीं होते
शिक्षा को एलिट सिस्टम की ओर धकेला जा रहा है

कई लोगों का कहना है कि सुधार जरूरी हैं, लेकिन बिना व्यापक चर्चा और जमीनी हकीकत को समझे नियम बनाना गलत है।

छात्रों और शिक्षकों में डर

इस नियम को लेकर छात्रों और शिक्षकों में भविष्य को लेकर चिंता बढ़ गई है।

छात्रों का कहना है कि—

करियर के रास्ते और संकरे हो जाएंगे
प्रतियोगिता के नाम पर दबाव बढ़ेगा
गरीब और मध्यम वर्ग के छात्रों के लिए आगे बढ़ना मुश्किल होगा

वहीं, शिक्षक संगठनों का कहना है कि नई शर्तें अनुभव और ज़मीनी काम को नजरअंदाज करती हैं।

सरकार की चुप्पी पर सवाल

अब तक केंद्र सरकार या शिक्षा मंत्रालय की ओर से इस विवाद पर कोई ठोस बयान सामने नहीं आया है। इस चुप्पी को लेकर भी सवाल उठ रहे है।

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