Delhi से लोग क्यों गायब हो रहे हैं ?

Report by : Sakshi Singh, National Khabar
- हर दिन 50 से ज्यादा लोग लापता: चौंकाने वाले आंकड़े
- महिलाएं और नाबालिग बच्चे: सबसे ज्यादा प्रभावित वर्

Delhi : हर दिन 50 से ज्यादा लोग लापता,सवालों के घेरे में सिस्टम
Delhi : देश की राजधानी दिल्ली, जिसे आधुनिकता, सुरक्षा और प्रशासनिक मजबूती का प्रतिक माना जाता हैं, आज एक गंभीर और डरावनी सच्चाई से जूझ रही हैं। सिर्फ 15 दिनों के भीतर दिल्ली से 807 लोग अचानक लापता हो जाना किसी एक घटना के सयोग का मामला नहीं हो सकता। यह आंकड़ा अपने आप में न सिर्फ चौंकाने वाला हैं, बल्कि सिस्टम की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता हैं।
इन 807 लापता लोगों में करीब 500 महिलाएं और 200 से अधिक नाबालिग बच्चे शामिल हैं। यानि औसतन हर दिन 50 से ज्यादा लोग बिना कोई निशान छोड़े गायब हो रहे हैं। ये सिर्फ आकड़े नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे टूटते परिवार, खत्म होती उम्मीदें और रोज का इंतज़ार छिपा हैं।

Delhi : पुलिस के आकड़े और जमीनी हकीकत
दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक इन 807 मामलों में से अब तक सिर्फ 235 लोगों का ही पता चल पाया हैं,जबकि 572 लोग आज भी लापता हैं। इन 572 लोगों के परिवार हर सुबह एक नई उम्मीद और हर रात एक नए दर के साथ जी रहे हैं।
लापता लोगों के परिजन बताते हैं कि शुरुआती दिनों में पुलिस सक्रीय दिखती हैं ,लेकिन वक़्त बीतने के साथ केस फाईलो में सिमट जाता हैं। कई मामलों में तो महीनों तक कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती,न कॉल डिटेल्स का अपडेट,न सीसीटीवी फुटेज का कोई नतीजा।
2015 से अब तक : ढाई लाख लापता,60 हज़ार आज भी गायब
अगर हम हालिया आंकड़ों से पीछे जाकर देखें,तो तस्वीर और भी भयावह नज़र आती हैं। साल 2015 से अब तक दिल्ली में ढाई लाख से ज्यादा लोग लापता हो चुके हैं। इनमें से करीब 56 प्रतिशत महिलाएं हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह हैं कि 60 हज़ार से ज्यादा लोग ऐसे हैं,जिनका आज तक कोई सुराग नहीं मिला।
Delhi : महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा असुरक्षित

लापता होने वालों में महिलाओं और नाबालिग बच्चों की संख्या सबसे अधिक होना कई सवाल खड़े करता है। क्या महिलाएं और बच्चे राजधानी में सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं? क्या सार्वजनिक जगहें, परिवहन व्यवस्था और कामकाजी माहौल उनके लिए सुरक्षित नहीं रह गए हैं? विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक मजबूरी, घरेलू हिंसा, झूठे नौकरी के वादे और सोशल मीडिया के जरिए फंसाए जाने जैसे कारणों से महिलाएं और बच्चे ज्यादा जोखिम में हैं।
Delhi : क्या सिस्टम की नाकामी है असली वजह?
सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब पुलिस और प्रशासन लगातार कार्रवाई का दावा करते हैं, तो फिर इतने पुराने मामले आज भी अधूरे क्यों हैं? कई परिवारों का आरोप है कि शुरुआती दिनों में ही अगर मामलों को गंभीरता से लिया जाता, तो शायद उनके अपने आज घर लौट चुके होते। एफआईआर दर्ज करने में देरी, जांच में सुस्ती और सीमित संसाधन—ये सब सिस्टम की कमजोरियों को उजागर करते हैं।
Delhi : Human Trafficking का शक और स्याह साया

इन आंकड़ों के बीच एक और डरावनी आशंका उभरकर सामने आती है—क्या इसके पीछे कोई संगठित ह्यूमन ट्रैफिकिंग नेटवर्क काम कर रहा है? सामाजिक संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि कई मामलों में लापता महिलाएं और बच्चे मानव तस्करी का शिकार हो सकते हैं। उन्हें दूसरे राज्यों या देशों में अवैध काम, जबरन मजदूरी या देह व्यापार में धकेले जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
Delhi : परिवारों का दर्द: एक अंतहीन इंतजार
लापता लोगों के परिवारों की जिंदगी मानो थम सी जाती है। न दिन चैन से कटता है, न रातों को नींद आती है। हर अनजान फोन कॉल, हर दरवाजे की आहट में उन्हें अपने प्रिय की उम्मीद नजर आती है। कई परिवार सालों से थानों, अदालतों और दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ तारीखें और आश्वासन ही मिले हैं।
Delhi : पुलिस की कार्रवाई और दावे
पुलिस का कहना है कि लापता लोगों की तलाश के लिए विशेष टीमें बनाई गई हैं, तकनीक का सहारा लिया जा रहा है और अंतरराज्यीय समन्वय भी बढ़ाया गया है। सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन और सोशल मीडिया की मदद से कई मामलों को सुलझाने का दावा भी किया जाता है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यह कोशिशें अभी नाकाफी साबित हो रही हैं।
Delhi : कानून और नीतियों की सीमाएं
कानूनी जानकारों का मानना है कि मौजूदा कानून और नीतियां तेजी से बदलते अपराध के तरीकों के सामने कमजोर पड़ रही हैं। मानव तस्करी जैसे संगठित अपराध से निपटने के लिए मजबूत कानून, तेज जांच प्रक्रिया और सख्त सजा की जरूरत है। साथ ही, राज्यों के बीच बेहतर तालमेल भी बेहद जरूरी है।
Delhi : Human Trafficking का शक और स्याह साया
यह समस्या सिर्फ पुलिस या सरकार की नहीं है। समाज की भी इसमें बड़ी भूमिका है। समय पर सूचना देना, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखना और पीड़ित परिवारों का साथ देना—ये सभी कदम किसी की जिंदगी बचा सकते हैं। कई मामलों में लापता लोग सामाजिक उपेक्षा और जागरूकता की कमी के कारण भी समय पर नहीं मिल पाते।
दिल्ली में हर दिन 50 से ज्यादा लोगों को गायब होना किसी भी सभ्य समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं हैं कि लोग क्यों लापता हो रहे हैं,बल्कि यह भी हैं कि उन्हें ढूढ़ने की कोशिशें इतनी कमजोर क्यों साबित हो रही हैं। क्या यह सिस्टम की नाकामी हैं,या इसके पीछे कोई बड़ा और संगठित नेटवर्क काम कर रहा हैं-इसका जवाब ढूढ़ना अब टाला नहीं जा सकता। जब तक सच्चाई सामने नहीं आएगी और ठोस कार्रवाई नहीं होगी,तब तक राजधानी की यह स्याह सच्चाई यूं ही लोगों को डराती रहेगी।







