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School : डिग्री हाथ में, हुनर तलाश में : फिर बेरोज़गारी क्यों पीछा नहीं छोड़ती ?

Report by : Sakshi Singh, National Khabar

  • डिग्री हाथ में, हुनर तलाश में: फिर बेरोज़गारी क्यों पीछा नहीं छोड़ती?
  • सवाल जो हर युवा पूछ रहा है
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School : सवाल जो हर युवा पूछ रहा है

आज हर मंच पर एक ही बात दोहराई जाती है -“डिग्री नहीं,स्केल देखी जाती है। ” बड़ी-बड़ी कंपनियां,स्टार्टअप्स और यहां तक कि सरकार भी स्किल डेवलपमेंट की बात करती है। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि देश में लाखों युवा डिग्री लेकर भी बेरोज़गार बैठे हैं। अगर सच में स्किल ज्यादा मायने रखती है,तो बेरोज़गार का आकड़ा लगातार क्यों बढ़ रहा है ? यह सवाल सिर्फ आंकड़ों का नहीं,बल्कि पूरे सिस्टम पर उठता है।

School : डिग्री बनाम स्किल : सोच से टकराव

डिग्री शिक्षा का प्रमाण है,जबकि स्किल उस शिक्षा का व्यावहारिक रूप। भारत में लंबे समय से मान्यता रही है कि अच्छी डिग्री मतलब अच्छी नौकरी। इसी सोच ने स्केल को हमेशा दूसरे नंबर पर रखा। छात्र सालों तक किताबों में उलझे रहते हैं,लेकिन उन्हें यह नहीं सिखाया जाता कि सीखी हुई चीज़ों का असल ज़िंदगी में इस्तेमाल कैसे करें। यही वजह है कि डिग्री और स्किल के बीच एक गहरी खाई बन चुकी है।

शिक्षा व्यवस्था : जहां से समस्या शुरू होती है

हमारी शिक्षा प्रणाली आज भी रटंत प्रणाली पर आधारित है। परीक्षा पास करना ही लक्ष्य बन गया है,न कि सीखना। कॉलेजो से निकलने वाले अधिकार छात्र इंडस्ट्री की जरूरतों के हिसाब से तैयार नहीं होते। उन्हें न तो आधुनिक तकनीकों का ज्ञान होता है,न ही कम्युनिकेशन और प्रॉब्लम सॉल्विंग जैसी बेसिक स्किल्स की ट्रेनिंग। नतीजा यह होता है कि कंपनियां कहती है-“योग्य उम्मीदवार नहीं मिलते। “

स्किल गैप : नौकरी है,लेकिन उम्मीदवार नहीं

यह सुनने में अजीब लगता है,लेकिन आज भारत में कई सेक्टर ऐसे हैं जहां नौकरियां खाली है,फिर भी बेरोज़गारी बढ़ रही है। इसका कारण है स्किल गैप। आईटी,हेल्थकेयर,डिजिटल मार्केटिंग,डेटा एनालिसिस जैसे क्षेत्रों में स्किल्ड लोगों की भारी मांग है,लेकिन हमारे युवा इन क्षेत्रों के लिए तैयार नहीं हैं। डिग्री होने के बाबजूद आवश्यक स्किल न होने से वे रेस से बाहर हो जाते है।

School : डिग्री की मज़बूरी और स्किल की अनदेखी

यह कहना गलत होगा कि डिग्री की कोई भूमिका नहीं है। डॉक्टर,इंजीनियर,वकील और सरकारी सेवाओं में डिग्री अनिवार्य है। लेकिन समस्या तब होती है जब डिग्री को ही अंतिम लक्ष्य मान लिया जाता है। छात्र यह सोचते है कि डिग्री मिलते ही नौकरी मिल जाएगी,इसलिए वे स्किल सिखने पर ध्यान नहीं देते। यही सोच आगे चलकर बेरोज़गारी की वजह बनती है।

School : आबादी का दबाब और सीमित अवसर

भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। हर साल करोड़ो युवा जॉब मार्किट में उतरते है,लेकिन उस अनुपात में रोजगार के अवसर पैदा नहीं हो रहे। ऑटोमेशन,आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस और मशीनो के बढ़ते इस्तेमाल ने भी कई नौकरियों को ख़त्म कर दिया है। ऐसे में स्किल होने के बाबजूद सभी को नौकरी मिल पाना मुश्किल हो गया है।

School : सामजिक सोच और करियर की गलत दिशा

हमारे समाज में आज भी कुछ चुनिंदा करियर को ही सफलता की पहचान माना जाता है। माता-पिता और समाज का दबाव युवाओं को उन्हीं रास्तों पर धकेल देता है,जहां पहले से ही भीड़ लगी होती है। कई युवा अपनी रूचि और क्षमता के बजाय सामाजिक प्रतिष्ठा को चुनते हैं,और जब उस क्षेत्र में असफल होते है तो बेरोज़गारी और निराशा बढ़ती है।

School : स्किल ट्रेनिंग : नाम बड़े,दर्शन छोटे

सरकार की ओर से कई स्किल डेवलपमेंट योजनाएं चलाई जा रही है,लेकिन जमीनी स्तर पर उनकी गुणवत्ता ओर प्रभाव सीमित है। अवसर ट्रेनिंग सिर्फ सर्टिफिकेट तक सिमट जाती है,जबकि असली जरुरत प्रैक्टिकल अनुभव और इंडस्ट्री एक्सपोज़र की होती है। बिना सही मार्गदर्शन के स्केल ट्रेनिंग भी बेरोज़गारी कम नहीं कर पाती।

School : हुनर के बिना डिग्री अधूरी है

यह सच्चाई है कि आज के दौर में डिग्री से ज्यादा स्किल मायने रखती है,लेकिन जब तक सिस्टम,समाज और सोच तीनों नहीं बदलेंगे,बेरोज़गारी की समस्या खत्म नहीं होगी। डिग्री और स्किल एक-दूसरे के विरोधी नहीं,बल्कि एक-दूसरे के परक है। जब हुनर को डिग्री के साथ बराबर की जगह मिलेगी,तभी युवा सिर्फ डिग्रीधारी नहीं,बल्कि रोजगार योग्य और आत्मनिर्भर बन पाएंगे।

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